Monday, 5 December 2016

अटल बिहारी वाजपेयी की दो कविताएँ

कल अटल बिहारी वाजपेयी की कवितायों का एक संकलन मिला। उसे धीरे-धीरे पढ़ रहा हूँ। अभी तक की बहतरीन अलफाज़ जो उनकी किताब से पढ़ें हैं, वह हैं: 

हाँ, खोज का सिलसिला न रूके,
धर्म की अनुभूनि,
विज्ञान का अनुसंधान,
एक दिन, अवश्य ही
रुद्ध द्वार खोलेगा।
प्रश्न पूछने के बजाय
यक्ष स्वयं उत्तर बोलेगा।

(रूद्ध - बंद, यक्ष - महाभारत में से एक प्राणी जो कि पाँडवों से सवाल पूछता है।)

इस के इलावा दो और कवितायों ने दिल को छू लिया है।

गीत नही गाता हूँ


बेनक़ाब चेहरे हैं,
दाग़ बड़े गहरे है,
टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूँ,
गीत नही गाता हूँ।

लगी कुछ ऐसी नज़र,
बिखरा शीशे-सा शहर,
अपने के मेले में मीत नही पाता हूँ,
गीत नही गाता हूँ।

पीठ में छुरी-सा चाँद,
राहू गया रेखा फाँद,
मुक्ति के क्षणों में बार-बार बँध जाता हूँ,
गीत नहीं गाता हूँ।

गीत नया गाता हूँ


टूटे हुए तारों से फूटे वासन्ती स्वर,
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर,
झरे सब पीले पात,
कोयल की कुहुक रात,
प्राची में अरूणिमा की रेख देख पाता हूँ।
गीत नया गाता हूँ।

टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी?
अन्तर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी।
हार नही मानूँगा,
रार नई ठानूँगा,
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ।
गीत नया गाता हूँ।


(वासन्ती स्वर – वसंत के मौसम के दौरान सुनने वाली आवाज़ें, कुहुक – कोयल की आवाज़ वाली, प्राची – पूरब दिशा, अरूणिमा – सुबह की रोशनी जिसे पाक माना जाता है)

Sunday, 20 November 2016

ਸ਼ੈਲ ਕੀ ਹੈ?

ਸ਼ੈਲ (Shell) ਕੰਪਿਊਟਰ ਦੇ ਆਪਰੇਟਿੰਗ ਸਿਸਟਮ ਨਾਲ ਗੱਲ ਕਰਨ ਦਾ ਇੱਕ ਤਰੀਕਾ ਹੈ, ਖਾਸ ਕਰਕੇ Linux ਅਤੇ UNIX ਸਿਸਟਮਾਂ ਵਿਚ।  

ਫਰਜ਼ ਕਰਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਸਾਨੂੰ ਫਾਇਰਫਾਕਸ (Firefox) ਵੈਬ ਬ੍ਰਾਊਜ਼ਰ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ ਹੈ। ਇਹ ਬ੍ਰਾਊਜ਼ਰ ਹੋਰਨਾਂ ਪ੍ਰੋਗਾਮਾ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾ ਕੰਪਿਊਟਰ ਦੀ ਹਾਰਡ-ਡਰਾਈਵ ਉੱਤੇ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਪ੍ਰੋਗਾਮ ਨੂੰ ਵਰਤਣ ਲਈ ਸਾਨੂੰ ਕਿਸੇ ਤਰੀਕੇ ਆਪਰੇਟਿੰਗ ਸਿਸਟਮ ਨੂੰ ਦੱਸਣਾ ਪੈਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਫਾਇਰਫਾਕਸ ਨੂੰ ਲਾਂਚ ਕਰੇ। ਇਸ ਦੇ ਦੋ ਤਰੀਕੇ ਹਨ।

  1. GUI
  2. ਸ਼ੈਲ

GUI


GUI, ਜਿਸ ਨੂੰ ਗੁਈ ਬੋਲਦੇ ਹਾਂ ਅਤੇ ਜਿਸਦੀ ਫੁਲ-ਫਾਰਮ ਗਰਾਫਿਕਲ ਯੂਜ਼ਰ ਇਨਟਰਫੇਸ (Graphical User Interface) ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਦੇ ਜ਼ਰੀਏ ਅਸੀ ਸਟਾਰਟ ਮੀਨੂ ਉੱਤੇ ਜਾ ਕੇ ਫਾਇਰਫਾਕਸ ਉੱਤੇ ਕਲਿਕ ਕਰਦੇ ਹਾਂ ਅਤੇ ਇਹ ਚਲ ਪੈਂਦਾ ਹੈ।




ਇਹ ਤਰੀਕਾ ਤਕਰੀਬਨ ਸਾਨੂੰ ਸਾਰਿਆਂ ਨੂੰ ਪਤਾ ਹੈ।

ਸ਼ੈਲ


ਸ਼ੈਲ ਆਪਰੇਟਿੰਗ ਸਿਸਟਮ ਨਾਲ ਗੱਲ ਕਰਨ ਦਾ ਇੱਕ ਮੁਤਬਾਦਲ (alternative) ਹੈ ਜੋ ਕਿ GUI ਤੋਂ ਜ਼ਿਆਦਾ ਪਾਵਰਫੁਲ ਹੈ। ਪਹਿਲਾਂ ਅਸੀ ਸ਼ੈਲ ਦੇ ਜ਼ਰੀਏ ਫਾਇਰਫਾਕਸ ਖੋਲਦੇ ਹਾਂ ਅਤੇ ਫਿਰ ਅਸੀ ਗੱਲ ਕਰਾਂਗੇ ਕਿ ਸ਼ੈਲ ਪਾਵਰਫੁਲ ਕਿਉਂ ਹੈ।



firefox ਟਾਈਪ ਕਰੋ ਅਤੇ ਇਹ ਖੁੱਲ ਜਾਵੇਗਾ।

ਸ਼ੈਲ ਪਾਵਰਫੁਲ ਕਿਉਂ ਹੈ?


ਹੁਣ ਤੁਸੀ ਸੋਚ ਰਹੇ ਹੋਵੋਗੇ ਕਿ ਇਹਦੇ ਵਿਚ ਕਿਹੜੀ ਵੱਡੀ ਗਲ ਹੈ। ਸ਼ੈਲ ਤੋਂ ਫਾਇਰਫਾਕਸ ਖੋਲਣਾ ਤਾਂ ਆਸਾਨ ਚੀਜ਼ ਨੂੰ ਮੁਸ਼ਕਲ ਬਣਾਉਣਾ ਹੈ। ਤੁਸੀ ਸਹੀ ਹੋ। 

ਸਾਡੀ ਉਦਾਹਰਨ ਵਿਚ ਸ਼ੈਲ GUI ਉੱਤੇ ਕੋਈ ਖਾਸ ਅਡਵਾਨਟਿਜ ਨਹੀ ਦਿੰਦਾ। ਲੇਕਿਨ ਹੋਰ ਕਈ ਕੰਪਿਊਟਰ ਪ੍ਰੋਸੇਸ ਹਨ ਜਿੱਥੇ ਸ਼ੈਲ ਨਾ ਸਿਰਫ਼ GUI ਤੋਂ ਵੱਧ ਕੁਸ਼ਲ (efficient) ਹੈ ਸਗੋਂ ਜ਼ਰੂਰੀ ਵੀ ਹੈ।

ਮੰਨ ਲਵੋ ਕਿ ਤੁਸੀ 1,000 PDF ਫਾਈਲਾਂ ਇੱਕ ਡਾਇਰੈਕਟਰੀ (ਫੋਲਡਰ) ਤੋਂ ਦੂਜੀ ਡਾਇਰੈਕਟਰੀ ਵਿਚ ਟ੍ਰਾਂਸਫਰ ਕਰਨੀਆਂ ਹਨ। ਇਹ ਵੀ ਮੰਨ ਲਵੋ ਕਿ ਪਹਿਲੀ ਡਾਇਰੈਕਟਰੀ ਦਾ ਨਾਂ ~/Desktop ਅਤੇ ਦੂਜੀ ਦਾ ਨਾਂ ~/Documents ਹੈ। 

ਹੁਣ ਇਹ ਸੋਚੋ ਕਿ ਕੀ ਹੋਵੇਗਾ ਜੇ ~/Desktop ਦੀਆਂ ਕੁਝ ਫਾਈਲਾਂ ~/Documents ਵਿਚ ਪਹਿਲਾਂ ਤੋਂ ਹੀ ਹੋਣ ਅਤੇ ~/Desktop 'ਤੇ PDF ਫਾਈਲਾਂ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਹੋਰ ਵੀ ਕਈ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਫਾਈਲਾਂ ਹੋਣ। GUI ਨਾਲ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕਾਪੀ ਕਰਨਾ ਮੁਸ਼ਕਿਲ ਹੈ। ਲੇਕਿਨ ਸ਼ੈਲ ਦੀ ਸਿਰਫ ਇੱਕ ਕਮਾਂਡ ਕਾਫ਼ੀ ਹੈ।

cp -u ~/Desktop/*pdf ~/Documents

ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਕਮਾਂਡ ਨਾਲ ਡੈਸਕਟਾਪ (~/Desktop) 'ਤੇ ਪਈਆਂ ਸਾਰੀਆਂ PDF ਫਾਈਲਾਂ ਡਾਕਯੂਮੈਂਟਸ (~/Documents) ਵਿਚ ਕਾਪੀ ਹੋ ਜਾਂਦੀਆ ਹਨ ਅਤੇ ਉਹ PDF ਫਾਈਲਾਂ ਜੋ ਪਹਿਲਾਂ ਤੋਂ ਹੀ ~/Documents ਵਿਚ ਹਨ ਕਾਪੀ ਨਹੀ ਹੁੰਦੀਆ।

ਇਹ ਕਿੰਝ ਹੋਇਆ?


ਇਸ ਕਮਾਂਡ ਦੇ ਚਾਰ ਹਿੱਸੇ ਹਨ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਕਾਪੀ ਕਰਨਾ ਮੁਮਕਿਨ ਬਣਾਇਆ ਕਮਾਂਡ ਦਾ ਢਾਂਚਾ ਵੇਖਣ ਨਾਲ ਸਾਨੂੰ ਇਹ ਸਮਝ ਆ ਜਾਵੇਗਾ ਕਿ ਇਹ ਚਮਤਕਾਰ ਕਿਵੇਂ ਹੋਇਆ


ਕਮਾਂਡ ਦਾ ਢਾਂਚਾ


(ਕਮਾਂਡ ਦਾ ਨਾਂ) (ਕੰਡਿਸ਼ਨ(ਇੱਥੋਂ ਕਾਪੀ ਕਰੋ) (ਇੱਥੇ ਕਾਪੀ ਕਰੋ)

ਕਮਾਂਡ ਦਾ ਨਾਂ (cp) - ਕਾਪੀ ਕਰੋ
ਕੰਡਿਸ਼ਨ (-u) - ਇਸ ਨੂੰ ਫਲੈਗ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ। ਇਸ ਦਾ ਮਤਲਬ ਹੈ ਕਿ ਜੇ ਕੋਈ ਫਾਇਲ ~/Documents ਵਿਚ ਪਹਿਲਾਂ ਤੋਂ ਹੀ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਉਸ ਨੂੰ ਕਾਪੀ ਨਾ ਕਰੋ।
ਇੱਥੋਂ ਕਾਪੀ ਕਰੋ ~Desktop/*pdf 'ਤੇ ਪਈ ਹਰ ਫਾਈਲ ਕਾਪੀ ਕਰੋ ਜਿਸਦਾ ਨਾਂ pdf ਵਿਚ ਖਤਮ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। * ਦਾ ਮਤਲਬ ਆਪਰੇਟਿੰਗ ਸਿਸਟਮ ਨੂੰ ਇਹ ਦੱਸਣਾ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਇਸ ਗਲ ਵਲ ਧਿਆਨ ਨਾ ਦੇਵੇ ਕਿ pdf ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਕੀ ਲਿੱਖਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ।
ਇੱਥੇ ਕਾਪੀ ਕਰੋ ~/Documents

ਖੁਦਾ ਹਾਫ਼ਿਜ਼

Sunday, 4 September 2016

सन् 1930 की एक सोवीयत पहेली

कल दफतर में ब्राउज़िंग करते वक्त सोवियत रसाले ज़नानीये सीला (Знание сила) का सन् 1930 के फरवरी में छपा एक इस्यू मिला। अभी मेरी रूसी इतनी अच्छी नही है कि मैं पूरी मैगज़ीन पढ सकूँ लेकिन रसाले के पहले सफे के सैक्शन "पहेलीयाँ और चुटकले" की पहली पहेली को एक डिक्शनरी की मदद से पढ लिया। अब मैं उसके हिन्दी तरजुमें को आप के साथ शेयर कर रहा हूँ। मेरी कोशिश जारी है। आप देखीये क्या आप इस 1930 की पहेली को सुलझा सकते हैं।



Задачи-шутки (बायीं तरफ टाॅप)


पहेली: Из двух свечей одинаковой длины одна может гореть 4 часа, а другая 5 часов. Однажды их зажгли одновременно на некоторое время и затем одновременно же потушили. Из двух огарков один оказался в четыре раза больше другого. Сколько времени горели свечи и какая часть каждой из них осталась?

अनुवाद: दो मोमबत्तीयों में से एक 4 घंटे और दूसरी 5 घंटे जल सकती है। एक बार दोनो को एक ही वक्त पर जला दिया गया और फिर एक ही वक्त पर बुझा दिया गया। अब यह देखा गया कि दोनो में से एक में दूसरी से चार गुना मोम बचा था। कितने समय तक मोमबत्तीयां जलीं और दोनों का कितना हिस्सा अभी तक बचा है?

Tuesday, 23 August 2016

दो सवाल हमारे समाज के बारे में

आज आॅफिस से आते वक्त एक रिक्शेवाले ने एक घर का पता पुछा। पता अंग्रेज़ी में लिखा हुआ था जिसे पढने में वह बुढा रिक्शेवाला असमर्थ था। वह अपने ग्राहक से भी नही पूछ सकता था क्यूंकि रिक्शे में किसी ग्राहक की बजाये सामान का एक डब्बा था। बेचारा। लेकिन इत्तेफाकन अच्छी बात यह हुई कि जिस घर में वह जाना चाहता था, उस का नंबर 2115 था और उस ने पता मकान नंबर 2124 के सामने खडे हो कर पुछा था। इस लिए मैं और अनीता (जो दफतर में साथ ही काम करती है) उस के साथ चल पडे और घर दिखा दिया।

इस बात ने मुझे दो बातें सोचने पर मजबूर किया।

पहली तो यह कि क्या वह रिक्शेवाता पढ नही सकता था? अगर वह पढने के नाकाबिल था तो उस की ज़िन्दगी कैसी होगी? और उस की ना पढ पाने की हालात का जिम्मेवार कौन है? वह खुद, उस के माँ-बाप, सरकार या, खलील जिबरान की नज़रों में, हम सब लोग जो कि अपनो का ही ख्याल रखने में नाकाबिल सिद्ध हो रहे हैं?

दूसरी बात जो मेरे ज़हन में आयी वो यह थी कि अगर वह रिक्शेवाला पढ सकता था तो जिस ने भी उसे पैसे दे कर भेजा, उस ने हिन्दी या पंजाबी या उस रिक्शेवाले की भाषा में पता क्यूँ नही लिखा? क्या उसे किसी स्थानिय ज़ुबान का इलम नही था? या फिर अंग्रेज़ी में लिखना रौब दिखाने का एक तरीका था?

मालूम नही।

Sunday, 21 August 2016

इस साल के गोलस की रिपोर्ट

साल के तकरीबन 8 महीने बीत चुके हैं और मैं अभी भी अपने गोल से बहुत दूर हूँ। इस साल मेरे दो गोल हैं: रुसी भाषा में किताबें पढ़ना शुरु करनी, और C++ और Qt को यूज़ करते हुए एक हिन्दी-रुसी डिक्शनरी बनानी या फिर कोई ऐसा प्रोग्राम बनाना जिसे प्रोफैश्नल प्रोग्रैमर इस्तेमाल लाइक समझें। अभी इस बात का जाएज़ा लेते हैं कि मैं कहाँ तक पहुँचा हूँ?

छोटे मोटे प्रोग्राम बनाने और एक महीने लगातार प्रैकटिस करने के इलावा मैंने कुछ भी नही किया। रूसी में मैनें A1 लैवल की एक किताब पढ़ ली है। लेकिन यह कोई बड़ी बात नही है। अभी रास्ता काफी लंबा है।

तो अब से मेरी कोशिश रहेगी कि वक्त कम ज़ाया करूँ और पढ़ाई पर ज़्यादा ध्यान दूँ। अब इस हफ्ते का गोल निरधारित करता हूँ।

- रोज़ कम से कम 4-5 घटें पड़ना
- 2 घटें C++ और 90 मिनट रूसी और बाकी वक्त साहित्य पढ़ना

पलैन काफी बनते हैं लेकिन अमल ही नही होता। ताकि मैं पुरानी गलतीयों को ना दोहरा पाऊँ, इस लिए अगले हफ्ते भी लिखूँगा कि मैंने इस हफ्ते क्या किया।

Thinking in C++ और Progit किताबों के पहले तीन-तीन चैपटरों की प्रैक्टिस। जहाँ तक रूसी का सवाल है, मैं प्रिंसटन युनिवरसिटी के रूसी कोरस 14वें चैपटर पर हूँ। इस हफ्ते का मकसद रहेगा 10 सबक खत्म करने। इस के इलावा तातियाना क्लीमोवा के पोडकास्ट के तीन एपीसोड सुनने।

Sunday, 17 April 2016

How can Popular Science Media Survive in the Time of a Crisis?

This is the title of a recent article in Science and Life, a respected popular science magazine in Russia. When I ran into the article two days ago, I didn’t think it would enlighten me on the problems faced by science magazines in Russia. I was expecting a cliché write-up; the author would blame everything on the profusion of the Internet, lack of state support and apathy from people, who didn’t care about science. Thankfully, it wasn't the case.

It was comforting to know that Russian-speakers had bought 7 billion issues of science magazines in the past 10 years. It’s a respectable number. But don’t let it give you the impression that the industry is having a party.

High delivery costs, large commissions and a dearth of kiosks are big problems facing the magazines. And a recent decision by the Russian government to spend 43 million 370 thousand rubles on a new publishing house to make science popular can reduce their sales, the article's author, Alisa Zaichenko, fears.

Zaichenko is also concerned about the quality of the works the state-owned publisher will produce.

The problem seems intractable. It is an issue if the state doesn't invest in science and there are problems if the state invests in science. Thankfully, Anton Ishchenko has an idea.

Anton Ishchenko is a Deputy in Duma. His idea is to support the existing magazines and popular science media instead of spending money on a new publisher. For obvious reasons, Science and Life is with Ishchenko. I'm not sure which idea is better, the government's or Ishchenko's.

In fact, if my desires had any worth I will want all the existing Russian science magazines to thrive and new publishers to appear.

Sunday, 28 February 2016

Review of Andy Weir's "The Martian"

I  finished Andy Weir’s The Martian two weeks ago. My boss had suggested it to me  around the time when water was found on Mars . I started reading it back in the December, 2015. I was on Chapter 14 when my Kindle stopped working. It died. The lower half of the screen went blank. I did not want to buy the book. So I did not continue. Then, a few days ago, a miracle happened.  

On   last Friday, another boss of mine—not the one who suggested me to read Weir's book—gifted me a brand new Kindle with a rock solid case. The first book I transferred to the device after returning to my room after work was The Martian. I did it not because I had fallen in love with the story when I was reading the book the first time, but more out of a duty to leave no  books unfinished this year.  I should say that I barely finished it. 

When I was a child, I used to dream of going to Mars alone. I am sure many children today harbour the same dream. Weir’s book is probably written for them. It is the story of a six astronauts—five from the U.S. and one from Germany—who go to Mars for research but have to abandon their Martian station because of an unusually fierce storm. On their way back to the ship, they lose a crew member,  Mark Watney. They think Watney is killed and will not learn about his being alive until they are half-way between Mars and the earth. 

Watney wakes up with some injured ribs or bones and starts thinking of some way to get back to the earth. But first, he has to tell the people on earth that he is alive. Something reminds him of an old Mars research rover a few tens of kilometres from where he is stranded. He jumps into the Mars cars his teammates had left behind, heads to Pathfinder (the research rover), salvages a radio and sends a signal to earth. The signal is received successfully because the researchers at NASA already know that he is  alive. 

After captain Lewis has left the Martian station, NASA takes some satellite images of the place. And in one of them, an observer  finds  signs of life. She tells others. So the decision makers at NASA came toknow that Watney is alive. They see him preparing for a trip to pathfinder and figure out that he will  contact them soon. NASA scrambles a team of people to ready the receiving equipment 

Once a communication link is set up, NASA starts working on a rescue plan.  Their plan is simple: Send a rocket full of supplies to Mars and so that Watney can survive until the next team of astronauts lands on the planet. At the same time, it is decided not to tell Lewis—the camp of Watney's team who took the decision to left him behind—and his crew about Watney. So the remaining group of five researchers on their way back to earth keep on believing W is dead.

The rocket launch fails. NASA contacts the China Space Research Administration. CSNA offers help by launching their own rocket to Mars. But someone at NASA comes up with another  plan. 

The plan is to tell the surviving crew that Watney is alive, send the CSNA rocket to the alive crew  and ask the crew if they can accept the supplies, take a U-turn and bring Watney back to earth. The crew members agree. But the problems do not end here. 

The remaining astronauts cannot land on Mars (their ship is not designed for landing on planets). The only way to rescue Watney is to meet him in the Martian orbit, which means  that Watney will have to launch himself in space. Thankfully, there is a spare rocket on Mars. Too many coincidences. Anyway. Although the managers at NASA consider the plan risky, they somehow agree to it. 

Then, the CSNA rocket supplies the remaining astronauts with a good amount of food and other supplies. Watney sits into his Martian car and reaches the rocket, which launches off and meets the remaining astronauts’ ship near Mars. The story ends. It was a happy ending. 

The story is good. But the writing is not. Andy Weir seems to have a penchant for cuss words. He sprinkles them liberally everywhere in the book. Then he explains some usual things in detail, but glosses over others. Unless you are profoundly interested in  manned space research, you may find it hard to figure out some things. For instance, I still only have a vague idea of how airlocks work. So many sections where they play a vital role were not clear to me. It was also unclear to me how can the drill be short circuited. And there were several other things that I did not understand. 

I confess I am not a geek. My knowledge is limited to what comes from dabbling into languages, learning how to program in C++ and reading literature on weekends. When I read the Weir's novel, I realized how much I do not know about science. It was a reality-check. And it is probably time I should spend sometime on maths, physics and biology. Also come computer science. I digress. 

If I were to review Weir’s book, I would say it is poorly written hard SF with a lot of adventure-boy-crazy-fantasies thrown in. I think Weir’s book is like 50 Shades of Hard SF. I trudged through the book. So I am glad that it is finished. I will never read it again. Hard SF by Robert L Forward, Liu Cixin, Arthur C Clarke and Ted Chiang is well-written and more fun to read. I think I will stick to them for some more time. 

Sunday, 31 January 2016

Semajna Raporto

Tiu ĉi semajno estis malsukcesa. Mi nek finlegis la libron Идиот (Idioto) de Fjodor Dostoevskij nek finstudis la ĉapitron 4 de la libro Программирование. Принципы и практика использования C++ (Programado. Principoj kaj praktitado uzante C++). El 658 paĝoj de la Dostoevskija libro, mi legis nur 150 paĝojn kaj nur la parto pri "praktikaj problemoj" (drills) mi solvis. Pri rusa, mi ne legis eĉ paĝon de la libro Удивительные истроии. Malbone. 

Nu, la tasko por la venonta semajno: 


  • Legi unu paĝon de rusa ĉiutage.
  • Legi 30 paĝojn de Idioto ĉiutage. 
  • Studi programadon dum 2 horoj ĉiutage. 
  • Studi matematikon dum 1 horo ĉiutage. 


Nu, eble mi forgesas ion. Ajnkaze. Tempo labori. 

Tuesday, 26 January 2016

Devas Labori kiel Pavel KORĈAGIN

Mi estis esperplena, kiam komencis la jaro 2015. Fiere mi skribis sur tiu ĉi blogo, ke antaŭ la fino de la jaro, mi posedos sufiĉan scion de rusa kaj franca por ĝui literaturon en tiuj lingvoj. Mi ankaŭ skribis, ke komputila programo kreita de mi estos parto de la KDE-programaro. Finlegi pli ol 50 librojn en kvin lingvoj ankaŭ estis parto de la plano. Ambicioj tiamaj estis senlimaj. Stultaĵo!

Nu, post jaro, mi tute ne kapablas legi eĉ gazetajn artikolojn ruse kaj france sen uzi vortaron. Scio de C++ estas ridinda. Kaj nur 20 librojn mi povis legi. Kiel multaj antaŭ jaroj, 2015 ankaŭ estis malsukcesa.

Ke la jaro estis malsukcesa ne estas kulpo de la mondo. Mi devas akcepti, ke kvankam mi ofte havas laŭdindajn ambiciojn, rare mi laboras diligente por aktualigi ilin. Tial, tiun ĉi jare mi devas lerni labori. Tio estos la sola celo de 2016.

Pro lerni labori, mi ne havos celojn grandajn. Miaj celoj estos ĉiutagaj aŭ ordinaraj. 

  1. Fini la kurson de C++, kiun skribis Bjarne Stroustrup. La kurso sin nomas Programming Principles and Practice. Por atingi tiun ĉi celon mi laboros du horojn ĉiutage.
  2. Fini la kurson Assimil Russe sans Peine, solvi ĉiujn ekzercojn en la baza kaj meznivela gramatikoj de rusa kaj legi 2 paĝojn de rusa ĉiutage. Unu horo ĉiutage. 
  3. Relerni matematikon lernejan. Pro tio, devas studi horon ĉiutage.
  4. Promeni aŭ kuri ĉiumatene aŭ ĉiuvespere dum 30 minutoj.
  5. Legi literaturon ĉiutage. 30 paĝoj. (Se eble, legi malmulte Esperante ĉiutage.) 

Hodiaŭ mi studis la programlingvon C++ dum 2 horoj kaj legis 50 paĝojn el la libro La Idioto (Dostoevskij). Ankaŭ promensis dum 60 minutoj. Restas lerni matematikon kaj rusan antaŭ dormado. 

Mi skribos pri mia laboro tiun ĉi dimanĉe.

Pavel KORĈAGIN estas heroo de romano Как закалялась сталь de Nikolaj OSTROVSKIJ.