Tuesday, 23 August 2016

दो सवाल हमारे समाज के बारे में

आज आॅफिस से आते वक्त एक रिक्शेवाले ने एक घर का पता पुछा। पता अंग्रेज़ी में लिखा हुआ था जिसे पढने में वह बुढा रिक्शेवाला असमर्थ था। वह अपने ग्राहक से भी नही पूछ सकता था क्यूंकि रिक्शे में किसी ग्राहक की बजाये सामान का एक डब्बा था। बेचारा। लेकिन इत्तेफाकन अच्छी बात यह हुई कि जिस घर में वह जाना चाहता था, उस का नंबर 2115 था और उस ने पता मकान नंबर 2124 के सामने खडे हो कर पुछा था। इस लिए मैं और अनीता (जो दफतर में साथ ही काम करती है) उस के साथ चल पडे और घर दिखा दिया।

इस बात ने मुझे दो बातें सोचने पर मजबूर किया।

पहली तो यह कि क्या वह रिक्शेवाता पढ नही सकता था? अगर वह पढने के नाकाबिल था तो उस की ज़िन्दगी कैसी होगी? और उस की ना पढ पाने की हालात का जिम्मेवार कौन है? वह खुद, उस के माँ-बाप, सरकार या, खलील जिबरान की नज़रों में, हम सब लोग जो कि अपनो का ही ख्याल रखने में नाकाबिल सिद्ध हो रहे हैं?

दूसरी बात जो मेरे ज़हन में आयी वो यह थी कि अगर वह रिक्शेवाला पढ सकता था तो जिस ने भी उसे पैसे दे कर भेजा, उस ने हिन्दी या पंजाबी या उस रिक्शेवाले की भाषा में पता क्यूँ नही लिखा? क्या उसे किसी स्थानिय ज़ुबान का इलम नही था? या फिर अंग्रेज़ी में लिखना रौब दिखाने का एक तरीका था?

मालूम नही।

Sunday, 21 August 2016

इस साल के गोलस की रिपोर्ट

साल के तकरीबन 8 महीने बीत चुके हैं और मैं अभी भी अपने गोल से बहुत दूर हूँ। इस साल मेरे दो गोल हैं: रुसी भाषा में किताबें पढ़ना शुरु करनी, और C++ और Qt को यूज़ करते हुए एक हिन्दी-रुसी डिक्शनरी बनानी या फिर कोई ऐसा प्रोग्राम बनाना जिसे प्रोफैश्नल प्रोग्रैमर इस्तेमाल लाइक समझें। अभी इस बात का जाएज़ा लेते हैं कि मैं कहाँ तक पहुँचा हूँ?

छोटे मोटे प्रोग्राम बनाने और एक महीने लगातार प्रैकटिस करने के इलावा मैंने कुछ भी नही किया। रूसी में मैनें A1 लैवल की एक किताब पढ़ ली है। लेकिन यह कोई बड़ी बात नही है। अभी रास्ता काफी लंबा है।

तो अब से मेरी कोशिश रहेगी कि वक्त कम ज़ाया करूँ और पढ़ाई पर ज़्यादा ध्यान दूँ। अब इस हफ्ते का गोल निरधारित करता हूँ।

- रोज़ कम से कम 4-5 घटें पड़ना
- 2 घटें C++ और 90 मिनट रूसी और बाकी वक्त साहित्य पढ़ना

पलैन काफी बनते हैं लेकिन अमल ही नही होता। ताकि मैं पुरानी गलतीयों को ना दोहरा पाऊँ, इस लिए अगले हफ्ते भी लिखूँगा कि मैंने इस हफ्ते क्या किया।

Thinking in C++ और Progit किताबों के पहले तीन-तीन चैपटरों की प्रैक्टिस। जहाँ तक रूसी का सवाल है, मैं प्रिंसटन युनिवरसिटी के रूसी कोरस 14वें चैपटर पर हूँ। इस हफ्ते का मकसद रहेगा 10 सबक खत्म करने। इस के इलावा तातियाना क्लीमोवा के पोडकास्ट के तीन एपीसोड सुनने।

Sunday, 17 April 2016

How can Popular Science Media Survive in the Time of a Crisis?

This is the title of a recent article in Science and Life, a respected popular science magazine in Russia. When I ran into the article two days ago, I didn’t think it would enlighten me on the problems faced by science magazines in Russia. I was expecting a cliché write-up; the author would blame everything on the profusion of the Internet, lack of state support and apathy from people, who didn’t care about science. Thankfully, it wasn't the case.

It was comforting to know that Russian-speakers had bought 7 billion issues of science magazines in the past 10 years. It’s a respectable number. But don’t let it give you the impression that the industry is having a party.

High delivery costs, large commissions and a dearth of kiosks are big problems facing the magazines. And a recent decision by the Russian government to spend 43 million 370 thousand rubles on a new publishing house to make science popular can reduce their sales, the article's author, Alisa Zaichenko, fears.

Zaichenko is also concerned about the quality of the works the state-owned publisher will produce.

The problem seems intractable. It is an issue if the state doesn't invest in science and there are problems if the state invests in science. Thankfully, Anton Ishchenko has an idea.

Anton Ishchenko is a Deputy in Duma. His idea is to support the existing magazines and popular science media instead of spending money on a new publisher. For obvious reasons, Science and Life is with Ishchenko. I'm not sure which idea is better, the government's or Ishchenko's.

In fact, if my desires had any worth I will want all the existing Russian science magazines to thrive and new publishers to appear.